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भा. कृ. अनु. प. - केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान
ICAR - CENTRAL AVIAN RESEARCH INSTITUTE
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मुर्गी के ट्रांसजेनिक शुक्राणुओें का विकास

ट्रांजेनिसिस द्वारा औषधीय महत्व की प्रोटीनों के उत्पादन हेतु मुर्गी एक उत्कृष्ट माॅडल के रूप् में बायोरिएक्टरकी तरह प्रयोग की जा सकती है। ताजा दिये गये अण्डे में भ्रूण,तक पहुँचने के लिए अण्डे के बाह्य छिलके को तोड़ना तथा जर्दी अत्यधिक मात्रा स्तनपक्षियों की अपेक्षा ट्रांसजैनिक मुर्गी के उत्पादन में आने वाली कुछ बाधायें है। शुक्राणु मध्यस्थ जीन स्थानान्तरण मुर्गी में ट्रांसजेनिसिस के लिए एक पसन्दीदा एवं सरल तरीका है परन्तु इसके लिए प्रथमतः ट्रांसजैनिक शुक्राणु को विकसित किया जाना परम आवश्यक चरण है।

शुक्राणु जीनोम में वाह्य डीएनए के एकीकरण की एक साधारण पद्धति विकसित कर इष्टतत्रीकृत की गई। सूक्ष्म विवरणानुसार इस पद्धति में सेट्रीफ्यूगेशन के द्वारा वीर्य से शुक्राणुओं को अलग कर,वाशिंग बफर में शुक्राणुओं की धुलाई करना और उसके बाद एक उपयुक्त बफर में निर्धारित सांद्रण में शुक्रााणुओं का तनुकरण किया जाता है। बाह्य डीएनए (वह जीन जिसका एकीकरण किया जाना है) और लापोसोम मिश्रण् को कुछ निश्चित अनुपात में मिश्रित कर तैयार किया गया तथा कमरे के तापमान पर ऊश्मायित (इंक्यूबेट) किया गया, इसी प्रकार एक अंतः केन्द्रीकीय इंजाइम (एनसीओएल) तथा लाइपोसोम दोनों को एक निर्धारित सांद्रण में मिश्रित कर तैयार किया गया तथा कमरे के तापमान पर ऊश्मायित (इक्यूवेट) किया गया। इसके बाद दोनों मिश्रणों को मिलाया गया तथा उसे कमरे के तापमान पर एक निर्धारित अवधि तक ऊश्मायित (इक्यूवेट) किया गया। इसे मुर्गी को संसेचित करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

माइक्रोसेटेलाइट मार्करो का प्रयोग करके पैतृक जीनोमिक अनुपात का आंकलन

सन्ततिजीनोन को आधा-आधा भाग माता व पिता (50% नर व 50% मादा पितर) से आता है। चूँकि डीएनए मार्कर भी जीनोम के ही भाग होते है। इसलिए मार्कर भी पितृ एवं मातृ पक्ष की ओर से वंशानुगत तरीके से आते है। इस लिए संतति में किसी विशिष्ट पितर के जीनों के अनुपात का आंकलन संतति के विशिष्ट पितर के मार्कर के अनुपात से किया जा सकता है,और इसे संतति व पितर की सह बैण्ड सहभागिता अनुपात के रूप् में अभिव्यक्त किया जा सकता है। जो कि वस्तुतः उन दोनों के मध्य अनुवांशिकी समानता को परिलक्षित करती है। मूल रूप् से इस विधि में पाॅलीमाॅफिक माइक्रोसेटेलाइट मार्करों की पहचान,पितरों तथा सन्तति के जीनोमिक डीएनए का पृथक्करण कर जीनोंमिक डीएन का एक पैनल तैयार करना शामिल है। प्रत्येक माइक्रो सेटेलाइट मार्करों के लिए जीनोंमि डीएनए के इस पैनल का प्रयोग कर पीसीआर विस्तारण,मेटाफर अगरास पर पृथक्कीकरण,एलील के आकार का निर्धारण तथा प्रत्येक मार्कर के साथ -साथ सभी मार्करो पर एक साथ सामान्य एलील के अनुपात का किया गया सह बंधों के इस समुच्चय अनुपाससत में पैतृक तथा सन्तति दोनों के बीच अनुवांशिक समानता दिखती है। जिसका प्रसार 0 से 1 तक होता है। जितना अधिक समानता अनुपात होगा उतना ही अधिक पितर का जीनोमिक अनुपात होगा।

गिनी फाउल मल्टीप्लेक्स पीसीआर द्वारा लिंग विभेदीकरण

पक्षियों में मादा पक्षी विषम युग्मकी लिंग (जेडडब्ल्यू) के होते है। तथा नर पक्षी समयुग्मकी लिंग (जेडजेड) होते है। इसलिए पीसीआर आधारित डब्ल्यू गुणसूत्र विशिष्ट अनुक्रम/जीन पद्धति लिंग विभेदीकर का एक प्रभावशाली तरीका हो सकता है डब्ल्यू गुणसूत्रविशिष्ट अनुक्रम आधारित पीसीआर पद्धति से लिंग विभेदीकरण में पीसीआर के असफल हो जाने एव नरों में कोई विस्तारण न होने के मध्य अन्तर न हो पाना एक प्रमुख समस्या है। इसलिए डब्ल्यू गुणसूत्र विशिष्ट यूएस1 यूएस3 प्रारम्भकों से 0.6 किलों बेस (इको आर1 द्वारा खण्डित मानक डीएन) का खण्ड जो कि मादा विशिष्ट खण्ड है तथा प्राइमरों का दूसरा सेट-डीएस1 और डीएस2 जो कि 16 एस आरआरएनए जीन विशिष्ट प्राइमर है, वे दोनों लिंगों उभय है। इनके प्रयेाग से एक मल्टीप्लेक्स पीसीआर का विकास किया गया। गिनी फाउल में मादा में दो बन्द दिखाई देगें जो कि 370 बीपी मादा विशिष्ट तथा 590 बीपी उभय बंध,जब कि नर में केवल एक 590 बीपी बंध दिखाई देगा। इस पद्धति का प्रयोग गिनी फाउल में एक दिवसीय चूजो में लिंग विभेदीकरण करने के लिए किया जा सकता है। इस प्रजाति में एक दिवसीय चूजो लैंगिक बहुरूपता बहुत अस्पष्ट देखी गयी है। pic1

मादाओं में दो बंध जैसे-370 तथा 590 बीपी एवं नर में 590 बीपी का विस्तारण

सीएमःनर मुर्गी,सीएफः मादा मुर्गी, जीएमः नर गिनी फाउल,जीएफः मादा गिनी फाउल, क्यूएम: नर बटेर,क्यूएफ मादा बटेर टीएम: नर टर्की, टीएफ मादा टर्की,एमः आण्विक आकार का मार्कर -1000बीपी डीएनए लैडर

पीसीआर-आरएफएलपी आधारित मांस प्रजाति चिन्हिकरण

मांस में मिलावट करना एक गंम्भीर अपराध है, और जब यह धार्मिक वर्जनाओं से जुड़ा़ हो तो मामला और भी अधिक गम्भीर हो जाता है। मांस की मौलिकता की पहचान के लिए प्रयेाग की जाने वाली विभिन्न पद्धतियों में डीएनए आधारित पद्धति बहुत अधिक विश्वसनीय है। डीएनए आधारित विधियों में माटोकोंड्रियल डीएनए आधारित पद्धतियों द्वारा मांस प्रजाति की पहचान,शाश्वत प्रारंभकों की डिजाइनिंग तथा कम अथवा प्रसंस्कृत /सडे़ नमूने से भी डीएनए की प्रचुर मात्रा के प्राप्त होने के कारण अधिक लाभप्रद है।
सामान्य नाम प्रतिबंधित इन्जाइम प्रतिबंधित खंड का अपेक्षित आकार
भैंस डीएसआरई-प 219,372
गाय डीएसआरई- प प 90,499
बकरी डीएसआरई- प प प 256,334
भेड़ डीएसआरई- पअ 312,278
सुअर डीएसआरई- अ 343,251
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अंतः केन्द्रकीय इन्जाइम द्वारा विश्लेषित चयनित 165 आरएनए खण्ड जो कि विभिन्न मांस नमूनों से प्रायः जिनोंमिक डीएनए द्वारा विस्तारित किया गया है। भैंस के मांस -डीएसआरई 1,गाय के मांस-डीएसआरई 2 बकरी के मांस -डीएसआरई 3,भेड़ के मांस -डीएसआरई 4, तथा सुअर के मांस -डीएसआरई 5 से निस्तारित जीनोमिक डीएनए से विस्तारित तथा चयनित 16 एस आरआरएनए खण्ड का आर ई विवरण अन्तः केन्द्रकीय प्रतिबंधित इन्जाईम बीः भैस,सीः गाय,जीः बकरी एसः भेड़,पी:सुअर

100 बीपी-1500 बीपी डीएनए लैडर

मूल रूप से, इस पद्धति में विभिन्न मांस नमूनों से जिनोंमिक डीएनए का पृथक्करण, उभय बन्धु का विस्तारण तदुपरान्त उनका प्रजाति विशिष्ट अन्त केन्दकीय इन्जाइम द्वारा विखण्डीकरण इत्यादि शामिल है। मौस प्रजाति की पहचान प्रजाति विशिष्ट अन्तः केन्द्रकीय इन्जाइम जनित प्रारूप द्वारा की जाती है। शाश्वत प्रारंभक विकसित किए गए जोकि लगभग 590 वेश पेयर का आंशिक माईटोकाॅडियल 16 एस आरआर एन खण्ड विस्तारण कर सकते है।

प्रतिरक्षा दक्षता में वृद्धि के लिए चयन मानदण्ड का विकास

उत्पादन से समझौता किए बगैर पक्षियों में प्रतिरक्षा दक्षता बढ़ना एक चुनौती पूर्ण कार्य है।मुर्गियों की प्रतिरक्षा दक्षता में वृद्धि करने के लिए सम्बन्धित अनुवांशिकी चयन प्रक्रियाओं का प्रजनन कार्यक्रमों में लागू करने के लिए इस प्रकार मानकीकृत तथा विकसित किया गया ताकि उत्पादन प्रभावित न हो। त्रिदोषज्ञय तथा कोशिका मध्यस्थ अनुक्रिया को ब्रायलर मुर्गी की प्रतिरक्षा जैवी प्राचलों के लिए विपरित दिशा में चयनित वंशावलियों की उत्तरोत्तर पीढि़यो में इस प्रकार बढ़ाया गया कि शरीर भार कम न हो।

रिकाॅम्बीनेन्ट साइटोकिन्स उत्पादन तथा सहौशध तथा वृद्धि उन्नायक के रूप में उनका प्रयोग

साईटोकिन्स प्रोटीन वर्ग का तत्व है जिसकों रिकाॅम्बीनेन्ट रूप् में सुरक्षित एवं प्राकृतिक सहौशध प्रतिरक्षा माडूलेटर तथा वृद्धि उनायक के रूप में प्रयोग किया जाता है।
कुक्कुट साइटोकिन्स नामतः आईएफएन-γ,आईएल-2,लिम्फोटैक्टिन तथा सीसीएलआई -4 प्रौक्रियोटिक अभिव्यंजना पद्धति में उत्पन्न किए गए । रिकाॅम्बीनेन्ट आईएल -2 का प्रयोग करने से एनडीटीका के प्रति उच्च अनुक्रिया हुई तथा रिकाॅम्बीनेन्ट आईएफएन-γ का प्रयोग करने से एनडीटीके के प्रति त्रिदोषज्ञय तथा कोशिका मध्यस्थ प्रतिरक्षण में उच्च अनुक्रिया प्राप्त हुई और इसके साथ-साथ ब्रायलर मुर्गियों में शरीर भार बढ़ा हुआ पाया गया कुक्कुट के रिकाम्बीनेन्ट साइटोकिन्स के उत्पादन एवं प्रयोग की प्रक्रिया का मूल्यांकन एवं मानकी करण किया गया।

न्यूकैसल रोग विषाणु के प्रति प्रतिरक्षा अनुक्रिया के लिए आण्विक मार्कर

कुक्कुट अनुवांशिकी में विषम रोगो के प्रति सुरक्षा बढ़ाने के लिए आण्विक मार्कर की पहचान सदा ही अनुसंधान का विषय रहा है।आईएफएनदृγ जीन के प्रामोटर क्षेत्र में एसएनपी (ए318जी) एनडी विषाणु के प्रति प्रतिरक्षा अनुक्रिया के साथ संलग्न पाया गया।एनडीली के प्रति प्रतिरक्षा अनुक्रिया को सुधारने के लिए एलील 318 जी को आण्विक मार्कर के रूप् में पहचाना गया।मुर्गियों के समूहों में 318 जी एली जो कि न्यूकैसल टीके की उच्च अनुक्रिया से संम्बद्व है, की बारम्बारता वृद्धि के लिए बिना उच्च सुविधा वाली प्रयोगशाला के व्यावसायिक प्रजनन कार्यक्रम में प्रयोग किये जाने योग्य सरल विधि को विकसित किया गया है।

सवंर्द्धित मुर्गी भ्रूण फाइब्रोब्लास्ट में मायोस्टेटिन जीन की निष्क्रियता

जैव प्रौद्योगिकीय विधियों का प्रयोग दैहिकीय सीमाओं से उबर कर मांसल विकास में वृद्धि की संभावनाओं के लिए किया जाता है। मायोस्टेटिन जीन की निष्क्रियता के लिए आरएनएआई का प्रयोग इसी दिशा में एक अगला कदम है। मायोस्टेटिन के लिए एसआईआरएनएएस को डिजाईन किया गया तथा सवंर्द्धित मुर्गी भ्रूण फाइब्रोब्लास्ट में मायोस्टेटिन जीन की निष्क्रियता के लिए प्रक्रिया विकसित की गई।